Ramdhari Singh Dinkar – Aadhunikta
आधुनिकता प्रश्न आधुनिकता की बही पर नाम अब भी तो चढ़ा दो, नायलन का कोट हम सिलवा चुके हैं; और
Read MorePunjabi, Hindi Poetry and Lyrics
आधुनिकता प्रश्न आधुनिकता की बही पर नाम अब भी तो चढ़ा दो, नायलन का कोट हम सिलवा चुके हैं; और
Read Moreसमर्पण धधका दो सारी आग एक झोंके में, थोड़ा-थोड़ा हर रोज जलाते क्यों हो? क्षण में जब यह हिमवान पिघल
Read Moreप्रकाश किरणों की यह वृष्टि! दीन पर दया करो, धरो, धरो, करुणामय! मेरी बाँह धरो। कोने का मैं एक कुसुम
Read Moreमाध्यम मैं माध्यम हूँ, मौलिक विचार नहीं, कनफ़्युशियस ने कहा । तो मौलिक विचार कहाँ मिलते हैं, खिले हुए फूल
Read Moreस्वर्ग स्वर्ग की जो कल्पना है, व्यर्थ क्यों कहते उसे तुम? धर्म बतलाता नहीं संधान यदि इसका? स्वर्ग का तुम
Read Moreभाइयो और बहनो लो शोणित, कुछ नहीं अगर यह आंसू और पसीना! सपने ही जब धधक उठें तब धरती पर
Read Moreराजकुमारी और बाँसुरी राजमहल के वातायन पर बैठी राजकुमारी, कोई विह्वल बजा रहा था नीचे वंशी प्यारी। “बस, बस, रुको,
Read Moreस्वर्ण घन उठो, क्षितिज-तट छोड़ गगन में कनक-वरण घन हे! बरसो, बरसो, भरें रंग से निखिल प्राण-मन हे! भींगे भुवन
Read Moreबापू जो कुछ था देय, दिया तुमने, सब लेकर भी हम हाथ पसारे हुए खड़े हैं आशा में; लेकिन, छींटों
Read Moreसूर्य सूर्य, तुम्हें देखते-देखते मैं वृद्ध हो गया । लोग कहते हैं, मैंने तुम्हारी किरणें पी हैं, तुम्हारी आग को
Read Moreकविता और आत्मज्ञान कविता क्या है ? महर्षि रमण ने कहा । मानसिक शक्तियों का मन्थन कर कीर्ति उत्पन्न करना,
Read Moreखोज खोजियो, तुम नहीं मानोगे, लेकिन संतों का कहना सही है । जिस घर में हम घूम रहे हैं, उससे
Read Moreपरंपरा परंपरा को अंधी लाठी से मत पीटो उसमें बहुत कुछ है जो जीवित है जीवन दायक है जैसे भी
Read Moreकुंजी घेरे था मुझे तुम्हारी साँसों का पवन, जब मैं बालक अबोध अनजान था। यह पवन तुम्हारी साँस का सौरभ
Read Moreअतीत के द्वार पर ‘जय हो’, खोलो अजिर-द्वार मेरे अतीत ओ अभिमानी! बाहर खड़ी लिये नीराजन कब से भावों की
Read Moreकरघा हर ज़िन्दगी कहीं न कहीं दूसरी ज़िन्दगी से टकराती है। हर ज़िन्दगी किसी न किसी ज़िन्दगी से मिल कर
Read Moreपर्वतारोही मैं पर्वतारोही हूँ। शिखर अभी दूर है। और मेरी साँस फूलनें लगी है। मुड़ कर देखता हूँ कि मैनें
Read Moreमृत्ति-तिलक सब लाए कनकाभ चूर्ण, विद्याधन हम क्या लाएँ? झुका शीश नरवीर ! कि हम मिट्टी का तिलक चढ़ाएँ ।
Read Moreवलि की खेती जो अनिल-स्कन्ध पर चढ़े हुए प्रच्छन्न अनल ! हुतप्राण वीर की ओ ज्वलन्त छाया अशेष ! यह
Read Moreअमृत-मंथन १ जय हो, छोड़ो जलधि-मूल, ऊपर आओ अविनाशी, पन्थ जोहती खड़ी कूल पर वसुधा दीन, पियासी । मन्दर थका,
Read Moreपटना जेल की दीवार से मृत्यु-भीत शत-लक्ष मानवों की करुणार्द्र पुकार! ढह पड़ना था तुम्हें अरी ! ओ पत्थर की
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