Suryakant Tripathi Nirala – Sehaj sehaj kar do
सहज-सहज कर दो सहज-सहज कर दो; सकलश रस भर दो। ठग ठगकर मन को लूट गये धन को, ऐसा असमंजस,
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सहज-सहज कर दो सहज-सहज कर दो; सकलश रस भर दो। ठग ठगकर मन को लूट गये धन को, ऐसा असमंजस,
Read Moreछोड़ दो, न छेड़ो टेढ़े छोड़ दो, न छेड़ो टेढ़े, कब बसे तुम्हारे खेड़े? यह राह तुम्हारी कब की जिसको
Read Moreकौन गुमान करो जिन्दगी का कौन गुमान करो जिन्दगी का? जो कुछ है कुल मान उन्हीं का। बाँधे हुए घर-बार
Read Moreये दुख के दिन काटे हैं जिसने ये दुख के दिन काटे हैं जिसने गिन गिनकर पल-छिन, तिन-तिन। आँसू की
Read Moreवासना-समासीना, महती जगती दीना वासना-समासीना, महती जगती दीना। जलद-पयोधर-भारा, रवि-शशि-तारक-हारा, व्योम-मुखच्छबिसारा शतधारा पथ-हीना। ॠषिकुल-कल-कण्ठस्तुति, दिव्य-शस्य-सकलाहुति, निगमागम-शास्त्रश्रुति रासभ-वासव-वीणा।
Read Moreनव तन कनक-किरण फूटी है नव तन कनक-किरण फूटी है। दुर्जय भय-बाधा छूटी है। प्रात धवल-कलि गात निरामय मधु-मकरन्द-गन्ध विशदाशय,
Read Moreघन तम से आवृत धरणी है घन तम से आवृत धरणी है; तुमुल तरंगों की तरणी है। मन्दिर में बन्दी
Read Moreक्यों मुझको तुम भूल गये हो क्यों मुझको तुम भूल गये हो? काट डाल क्या, मूल गये हो। रवि की
Read Moreपाप तुम्हारे पांव पड़ा था पाप तुम्हारे पांव पड़ा था, हाथ जोड़कर ठांव खड़ा था। विगत युगों का जंग लगा
Read Moreनव जीवन की बीन बजाई नव जीवन की बीन बजाई। प्रात रागिनी क्षीण बजाई। घर-घर नये-नये मुख, नव कर, भरकर
Read Moreतुम ही हुए रखवाल तुम ही हुए रखवाल तो उसका कौन न होगा? फूली-फली तरु-डाल तो उसका कौन न होगा?
Read Moreमानव का मन शान्त करो हे मानव का मन शान्त करो हे! काम, क्रोध, मद, लोभ दम्भ से जीवन को
Read Moreवे कह जो गये कल आने को वे कह जो गये कल आने को, सखि, बीत गये कितने कल्पों। खग-पांख-मढी
Read Moreतन, मन, धन वारे हैं तन, मन, धन वारे हैं; परम-रमण, पाप-शमन, स्थावर-जंगम-जीवन; उद्दीपन, सन्दीपन, सुनयन रतनारे हैं। उनके वर
Read Moreखुल कर गिरती है खुल कर गिरती है जो, उड़ती फिरती है। ऐसी ही एक बात चलती है, घात खड़ी-खड़ी
Read Moreहंसो अधर-धरी हंसी हंसो अधर-धरी हंसी, बसो प्राण-प्राण-बसी। करुणा के रस ऊर्वर कर दो ऊसर-ऊसर दुख की सन्ध्या धूसर हीरक-तारकों-कसी।
Read Moreभजन कर हरि के चरण, मन भजन कर हरि के चरण, मन! पार कर मायावरण, मन! कलुष के कर से
Read Moreकठिन यह संसार, कैसे विनिस्तार कठिन यह संसार, कैसे विनिस्तार? ऊर्मि का पाथार कैसे करे पार? अयुत भंगुर तरंगों टूटता
Read Moreअनमिल-अनमिल मिलते अनमिल-अनमिल मिलते प्राण, गीत तो खिलते। उड़ती हैं छुट-छुटकर आँखें मन के नभ पर और किसी मणि के
Read Moreनील जलधि जल नील जलधि जल, नील गगन-तल, नील कमल-दल, नील नयन द्वय। नील मॄत्ति पर नील मृत्यु-शर, नील अनिल-कर,
Read Moreहार तुमसे बनी है जय हार तुमसे बनी है जय, जीत की जो चक्षु में क्षय। विषम कम्पन बली के
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