Faiz Ahmed Faiz – Hawase manzilein laila na tujhko hai na mujhe
हवसे-मंज़िले-लैला न तुझे है न मुझे हवसे-मंज़िले-लैला न तुझे है न मुझे ताबे-सरगरमी-ए-सहरा न तुझे है न मुझे मैं भी
Read MorePunjabi, Hindi Poetry and Lyrics
हवसे-मंज़िले-लैला न तुझे है न मुझे हवसे-मंज़िले-लैला न तुझे है न मुझे ताबे-सरगरमी-ए-सहरा न तुझे है न मुझे मैं भी
Read Moreकब तक दिल की ख़ैर मनाएँ, कब तक रह दिखलाओगे कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ, कब तक रह दिखलाओगे
Read Moreकहीं तो कारवाने-दर्द की मंज़िल ठहर जाए कहीं तो कारवाने-दर्द की मंज़िल ठहर जाये किनारे आ लगे उमरे-रवां या दिल
Read Moreनहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही नहीं विसाल मयस्सर तो
Read Moreन किसी पे ज़ख़्म अयाँ कोई न किसी पे ज़ख़म अयां कोई, न किसी को फ़िकर रफ़ू की है न
Read Moreवक़्फ़े-उमीदे-दीदे-यार है दिल वक़्फ़े-उमीदे-दीदे-यार है दिल फ़स्ले-गुल और सोगवार है दिल जानता है कि वो न आएँगे फिर भी मसरूफ़े-इन्तज़ार
Read Moreलिया-दिया तुमसे मेरा था लिया-दिया तुमसे मेरा था, दुनिया सपने का डेरा था। अपने चक्कर से कुल कट गये, काम
Read Moreगीत गाने दो मुझे तो गीत गाने दो मुझे तो, वेदना को रोकने को। चोट खाकर राह चलते होश के
Read Moreसहज-सहज कर दो सहज-सहज कर दो; सकलश रस भर दो। ठग ठगकर मन को लूट गये धन को, ऐसा असमंजस,
Read Moreछोड़ दो, न छेड़ो टेढ़े छोड़ दो, न छेड़ो टेढ़े, कब बसे तुम्हारे खेड़े? यह राह तुम्हारी कब की जिसको
Read Moreकौन गुमान करो जिन्दगी का कौन गुमान करो जिन्दगी का? जो कुछ है कुल मान उन्हीं का। बाँधे हुए घर-बार
Read Moreये दुख के दिन काटे हैं जिसने ये दुख के दिन काटे हैं जिसने गिन गिनकर पल-छिन, तिन-तिन। आँसू की
Read Moreवासना-समासीना, महती जगती दीना वासना-समासीना, महती जगती दीना। जलद-पयोधर-भारा, रवि-शशि-तारक-हारा, व्योम-मुखच्छबिसारा शतधारा पथ-हीना। ॠषिकुल-कल-कण्ठस्तुति, दिव्य-शस्य-सकलाहुति, निगमागम-शास्त्रश्रुति रासभ-वासव-वीणा।
Read Moreकरघा हर ज़िन्दगी कहीं न कहीं दूसरी ज़िन्दगी से टकराती है। हर ज़िन्दगी किसी न किसी ज़िन्दगी से मिल कर
Read Moreपर्वतारोही मैं पर्वतारोही हूँ। शिखर अभी दूर है। और मेरी साँस फूलनें लगी है। मुड़ कर देखता हूँ कि मैनें
Read Moreमृत्ति-तिलक सब लाए कनकाभ चूर्ण, विद्याधन हम क्या लाएँ? झुका शीश नरवीर ! कि हम मिट्टी का तिलक चढ़ाएँ ।
Read Moreवलि की खेती जो अनिल-स्कन्ध पर चढ़े हुए प्रच्छन्न अनल ! हुतप्राण वीर की ओ ज्वलन्त छाया अशेष ! यह
Read Moreअमृत-मंथन १ जय हो, छोड़ो जलधि-मूल, ऊपर आओ अविनाशी, पन्थ जोहती खड़ी कूल पर वसुधा दीन, पियासी । मन्दर थका,
Read Moreअनिल बिस्वास के लिए हरेक हर्फ़े-तमन्ना इस इज़्तिरार में है कि फिर नसीब हो दरबारे-यारे-बंदः नवाज़ हर इक ग़ज़ल का
Read Moreऔर फिर एक दिन यूँ ख़िज़ाँ आ गई और फिर इक दिन यूं ख़िज़ां आ गई आबनूसी तनों के बरहना
Read Moreबालीं पे कहीं रात ढल रही है बालीं पे कहीं रात ढल रही है या शम्अ पिघल रही है पहलू
Read More