Javed Akhtar – Banjara
मैं बंजारा वक़्त के कितने शहरों से गुज़रा हूँ लेकिन वक़्त के इस इक शहर से जाते जाते मुड़ के
Read MorePunjabi, Hindi Poetry and Lyrics
मैं बंजारा वक़्त के कितने शहरों से गुज़रा हूँ लेकिन वक़्त के इस इक शहर से जाते जाते मुड़ के
Read Moreकितना अरसा हुआ कोई उम्मीद जलाये, कितनी मुद्दत हुयी किसी कंदील पे जलती रौशनी रखे । चलते फिरते इस सुनसान
Read Moreदिल में महक रहे हैं किसी आरज़ू के फूल पलकों में खिलनेवाले हैं शायद लहू के फूल अब तक है
Read Moreसितारे लटके हुए हैं तागों से आस्माँ पर चमकती चिंगारियाँ-सी चकरा रहीं आँखों की पुतलियों में नज़र पे चिपके हुए
Read Moreसूखी टहनी तन्हा चिड़िया फीका चाँद आँखों के सहरा में एक नमी का चाँद उस माथे को चूमे कितने दिन
Read Moreआदमी बुलबुला है पानी का और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है, फिर उभरता है,
Read Moreजब वो कम-उम्र ही था उस ने ये जान लिया था कि अगर जीना है बड़ी चालाकी से जीना होगा
Read Moreआज फिर चाँद की पेशानी से उठता है धुआँ आज फिर महकी हुई रात में जलना होगा आज फिर सीने
Read Moreए माँ टेरेसा मुझको तेरी अज़मत से इनकार नहीं है जाने कितने सूखे लब और वीराँ आँखें जाने कितने थके
Read Moreक्या लिए जाते हो तुम कन्धों पे यारो इस जनाज़े में तो कोई भी नहीं है, दर्द है न कोई,
Read Moreआज इस शहर में हर शख़्स हिरासाँ क्यूँ है चेहरे क्यों फ़क़ हैं गली कूचों में किसलिए चलती है ख़ामोशो-सरासीमा
Read More1. अल्फाज जो उगते, मुरझाते, जलते, बुझते रहते हैं मेरे चारों तरफ, अल्फाज़ जो मेरे गिर्द पतंगों की सूरत उड़ते
Read Moreमेरा आँगन कितना कुशादा कितना बड़ा था जिसमें मेरे सारे खेल समा जाते थे और आँगन के आगे था वह
Read Moreमैं खंडहरों की ज़मीं पे कब से भटक रहा हूं क़दीम रातों की टूटी क़ब्रों के मैले कुतबे दिनों की
Read Moreहमारे शौक़ की ये इन्तहा थी क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी बिछड़ के डार से बन-बन फिरा वो हिरन
Read Moreछोटे थे, माँ उपले थापा करती थी हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे आँख लगाकर – कान बनाकर नाक
Read Moreवो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है जो
Read Moreखेत के सब्ज़े में बेसुध सी पड़ी है दुबकी एक पगडंडी की कुचली हुई अधमुई सी लाश तेज़ कदमो के
Read Moreगहरा सन्नाटा है कुछ मकानों से ख़ामेश उठता हुआ गाढ़ा काला धुआँ मैल दिल में लिए हर तरफ़ दूर तक
Read Moreदिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म जैसे जंगल में शाम के साये जाते-जाते सहम के रुक जाएँ मुडके देखे
Read Moreख़्वाब के गाँव में पले हैं हम पानी छलनी में ले चले हैं हम छाछ फूंकें कि अपने बचपन में
Read More