Hindi Poetry

Gulzar – Khol kar baahon ke do uljhe huye se misre


खोलकर बाँहों के दो उलझे हुए-से मिसरे

खोलकर बाँहों के दो उलझे हुए-से मिसरे
हौले से चूमके दो नींद से छलकी हुई पलकें
होंट से लिपटी हुई जुल्फ़ को मिन्नत से हटाकर
कान पर धीमे से रख दूँगा जो आवाज़ के दो होंट
मैं जगाऊँगा तुम्हें नाम से ‘सोनाँ-ओए सोनाँ !’

-और तुम धीरे से जब पलके उठाओगी ना, उस वक़्त
दूर ठहरे हुए पानी से सहर खोलेगी आँखें
सुबह हो जाएगी तब सुबह ज़मीं पर

(सहर=सबेरा)