Hindi Poetry

Gulzar – Ukhaad do arz o tool khoonton se bastiyon ke


उखाड़ दो अरज़-ओ-तूल खूँटों से बस्तियों के

उखाड़ दो अरज़-ओ-तूल खूँटों से बस्तियों के
समेटो सड़कें, लपेटो राहें
उखाड़ दो शहर का कशीदा
कि ईंट-गारे से घर नहीं बन सका किसी का

पनाह मिल जाये रूह को जिसका हाथ छूकर
उसी हथेली पर घर बना लो
कि घर वही है
पनाह भी है।
तुम्हारे हाथों में मैंने देखी थी एक अपनी लकीर, सोनाँ

(अरज़-ओ-तूल=लंबाई और चौड़ाई, विस्तार)