Mirza Ghalib – Yeh hum jo hijar mein deewar-o-dar ko dekhte hain
ये हम जो हिजर में दीवार-ओ-दर को देखते हैं कभी सबा तो कभी नामाबर को देखते हैं वो आये घर
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ये हम जो हिजर में दीवार-ओ-दर को देखते हैं कभी सबा तो कभी नामाबर को देखते हैं वो आये घर
Read Moreशौक हर रंग, रकीबे-सरो-सामां निकला कैस तसवीर के परदे में भी उरीयां निकला ज़ख़्म ने दाद न दी तंगीए-दिल की
Read Moreवो फ़िराक और वो विसाल कहां वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहां फ़ुरसत-ए-कारोबार-ए-शौक किसे जौक-ए-नज़्ज़ारा-ए-जमाल कहां दिल तो दिल वो दिमाग़ भी न
Read Moreरहीये अब ऐसी जगह चलकर, जहां कोई न हो हम-सुखन कोई न हो और हम जुबां कोई न हो बेदरो-दीवार
Read Moreफिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया दिल जिगर तिशना-ए-फ़रियाद आया दम लीया था न क्यामत ने हनोज़ फिर तेरा वकते-सफ़र याद
Read Moreनुकताचीं है, ग़मे-दिल उसको सुनाये न बने क्या बने बात, जहां बात बनाये न बने मैं बुलाता तो हूं उसको,
Read Moreन था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो
Read Moreनक्श फरियादी है किसकी शोख़ी-ए-तहरीर का काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तसवीर का कावे-कावे सख़तजानीहा-ए-तनहायी न पूछ सुबह करना शाम का
Read Moreमेरे शौक दा नहीं इतबार तैनूं, आजा वेख मेरा इंतज़ार आजा । ऐवें लड़न बहानने लभ्भना एं, की तूं सोचना
Read Moreदोसत ग़मखवारी में मेरी सअयी फ़रमायेंगे क्या ज़ख़्म के भरते तलक नाखुन न बढ़ जाएंगे क्या बेन्याजी हद से गुज़री,
Read Moreघर हमारा जो न रोते भी तो वीरां होता बहर गर बहर न होता तो बयाबां होता तंगी-ए-दिल का गिला
Read Moreहै बस कि हर इक उनके इशारे में निशां और करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमां और या रब
Read Moreहर इक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है तुमहीं कहो कि ये अन्दाज़े-गुफ़तगू क्या है न शोले
Read Moreदिले-नादां तुझे हुआ क्या है आख़िर इस दर्द की दवा क्या है हम हैं मुशताक और वो बेज़ार या इलाही
Read Moreकी वफ़ा हमसे तो ग़ैर उसको जफ़ा कहते हैं होती आई है कि अच्छों को बुरा कहते हैं आज हम
Read Moreजहां तेरा नक्शे-कदम देखते हैं ख़ियाबां ख़ियाबां इरम देखते हैं दिल आशुफ़तगा खाले-कुंजे-दहन के सुवैदा में सैरे-अदम देखते हैं तिरे
Read Moreकोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद कयों रात भर
Read Moreमेहरबां हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वकत मैं गया वकत नहीं हूं कि फिर आ भी न सकूं
Read Moreदिल ही तो है न संग-ओ-ख़िशत दर्द से भर न आये कयों रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये कयों
Read Moreधमकी में मर गया, जो न बाबे-नबरद था इशके-नबरद पेशा, तलबगारे-मरद था था ज़िन्दगी में मरग का खटका लगा हुआ
Read Moreदायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूं मैं ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूं मैं कयों गरदिश-ए-मुदाम
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