Faiz Ahmed Faiz – Humne shab sher mein sanwaare the
हमने सब शे’र में सँवारे थे हमने सब शे’र में सँवारे थे हमसे जितने सुख़न तुम्हारे थे रंगों ख़ुश्बू के,
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हमने सब शे’र में सँवारे थे हमने सब शे’र में सँवारे थे हमसे जितने सुख़न तुम्हारे थे रंगों ख़ुश्बू के,
Read Moreकिस शह्र न शोहरा हुआ नादानी-ए-दिल का किस शह्र न शोहरा हुआ नादानी-ए-दिल का किस पर न खुला राज़ परीशानी-ए-दिल
Read Moreएक दकनी ग़ज़ल कुछ पहले इन आँखों आगे क्या-क्या न नज़ारा गुज़रे था क्या रौशन हो जाती थी गली जब
Read Moreलघु-तटिनी, तट छाईं कलियां लघु-तटिनी, तट छाईं कलियां; गूँजी अलियों की आवलियाँ। तरियों की परियाँ हैं जल पर, गाती हैं
Read Moreचलीं निशि में तुम आई प्रात चलीं निशि में तुम आई प्रात; नवल वीक्षण, नवकर सम्पात, नूपुर के निक्वण कूजे
Read Moreप्रिय के हाथ लगाये जागी प्रिय के हाथ लगाये जागी, ऐसी मैं सो गई अभागी। हरसिंगार के फूल झर गये,
Read Moreतुमने स्वर के आलोक-ढले तुमने स्वर के आलोक-ढले गाये हैं गाने गले-गले। बचकर भव की भंगुरता से रागों के सुमनों
Read Moreवन-वन के झरे पात वन-वन के झरे पात, नग्न हुई विजन-गात। जैसे छाया के क्षण हंसा किसी को उपवन, अब
Read Moreतुमसे जो मिले नयन तुमसे जो मिले नयन, दूर हुए दुरित-शयन। खिले अंग-अंग अमल सर के पातः-शतदल पावन-पवनोत्कल-पल, अलक-मन्द-गन्ध-वयन। खग-कुल
Read Moreवेदना बनी मेरी अवनी वेदना बनी; मेरी अवनी। कठिन-कठिन हुए मृदुल पद-कमल विपद संकल भूमि हुई शयन-तुमुल कण्टकों घनी। तुमने
Read Moreहरि का मन से गुणगान करो हरि का मन से गुणगान करो, तुम और गुमान करो, न करो। स्वर-गंगा का
Read Moreआंख बचाते हो तो क्या आते हो आँख बचाते हो तो क्या आते हो? काम हमारा बिगड़ गया देखा रूप
Read Moreआशा की वंशी लिख रहे गीत इस अंधकार में भी तुम रवि से काले बरछे जब बरस रहे हैं, सरिताएँ
Read Moreपावस-गीत अम्बर के गृह गान रे, घन-पाहुन आये। इन्द्रधनुष मेचक-रुचि-हारी, पीत वर्ण दामिनि-द्युति न्यारी, प्रिय की छवि पहचान रे, नीलम
Read Moreआनंदातिरेक आनन्द का अतिरेक यह । हो मृत्यु की धारा अगर तो मुक्त बहने दो मुझे; हो जिन्दगी की छाँह
Read Moreजीवन पत्थरों में भी कहीं कुछ सुगबुगी है ? दूब यह चट्टान पर कैसे उगी है ? ध्वंस पर जैसे
Read Moreये गान बहुत रोये तुम बसे नहीं इनमें आकर, ये गान बहुत रोये । बिजली बन घन में रोज हँसा
Read Moreचंद्राह्वान जागो हे अविनाशी ! जागो किरणपुरुष ! कुमुदासन ! विधु-मंडल के वासी ! जागो है अविनाशी ! रत्न-जड़ित-पथ-चारी, जागो,
Read Moreआधुनिकता प्रश्न आधुनिकता की बही पर नाम अब भी तो चढ़ा दो, नायलन का कोट हम सिलवा चुके हैं; और
Read Moreसमर्पण धधका दो सारी आग एक झोंके में, थोड़ा-थोड़ा हर रोज जलाते क्यों हो? क्षण में जब यह हिमवान पिघल
Read Moreप्रकाश किरणों की यह वृष्टि! दीन पर दया करो, धरो, धरो, करुणामय! मेरी बाँह धरो। कोने का मैं एक कुसुम
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