Ramdhari Singh Dinkar – Madhyam
माध्यम मैं माध्यम हूँ, मौलिक विचार नहीं, कनफ़्युशियस ने कहा । तो मौलिक विचार कहाँ मिलते हैं, खिले हुए फूल
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माध्यम मैं माध्यम हूँ, मौलिक विचार नहीं, कनफ़्युशियस ने कहा । तो मौलिक विचार कहाँ मिलते हैं, खिले हुए फूल
Read Moreस्वर्ग स्वर्ग की जो कल्पना है, व्यर्थ क्यों कहते उसे तुम? धर्म बतलाता नहीं संधान यदि इसका? स्वर्ग का तुम
Read Moreभाइयो और बहनो लो शोणित, कुछ नहीं अगर यह आंसू और पसीना! सपने ही जब धधक उठें तब धरती पर
Read Moreराजकुमारी और बाँसुरी राजमहल के वातायन पर बैठी राजकुमारी, कोई विह्वल बजा रहा था नीचे वंशी प्यारी। “बस, बस, रुको,
Read Moreस्वर्ण घन उठो, क्षितिज-तट छोड़ गगन में कनक-वरण घन हे! बरसो, बरसो, भरें रंग से निखिल प्राण-मन हे! भींगे भुवन
Read Moreबापू जो कुछ था देय, दिया तुमने, सब लेकर भी हम हाथ पसारे हुए खड़े हैं आशा में; लेकिन, छींटों
Read Moreपास रहो तुम मेरे पास रहो मेरे कातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो जिस घड़ी रात चले आसमानों का लहू
Read Moreमंज़र रहगुज़र, साये, शजर, मंज़िल-ओ-दर, हल्क़ःए-बाम बाम पर सीना-ए-महताब खुला आहिस्ता जिस तरह खोले कोई बंदे-क़बा आहिस्ता हल्क़ा-ए-बाम तले, सायों
Read Moreन अब रकीब न नासेह न ग़मगुसार कोई न अब रकीब न नासेह न ग़मगुसार कोई तुम आशना थे तो
Read Moreनज़रे-हाफ़िज़ नासेहम गुफ़त बजुज़ ग़म चे हुनर दारद इश्क बिरो ऐ ख़्वाज़ा-ए-आकिल हुनर-ए-बेहतर अज़ीं कन्दे-दहन कुछ इससे ज़ियादा लुतफ़े-सुख़न कुछ
Read Moreसभी कुछ है तेरा दिया हुआ, सभी राहतें सभी कुलफतें सभी कुछ है तेरा दिया हुआ, सभी राहतें सभी कुलफतें
Read Moreसहल यूं राहे-ज़िन्दगी की है सहल यूं राहे-ज़िन्दगी की है हर कदम हमने आशिकी की है हमने दिल में सजा
Read Moreसितम सिखलाएगा रस्मे-वफ़ा ऐसे नहीं होता सितम सिखलाएगा रस्मे-वफ़ा ऐसे नहीं होता सनम दिखलाएँगे राहे-ख़ुदा ऐसे नहीं होता गिनो सब
Read Moreतुझे पुकारा है बेइरादा तुझे पुकारा है बेइरादा जो दिल दुखा है बहुत ज़ियादा नदीम हो तेरा हरफ़े-शीरीं तो रंग
Read Moreवो बुतों ने डाले हैं वस्वसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया वो बुतों ने डाले हैं वस्वसे कि दिलों से
Read Moreमख़दूम की याद में-2 “याद का फिर कोई दरवाज़ा खुला आख़िरे-शब” दिल में बिख़री कोई ख़ुशबू-ए-क़बा आख़िरे-शब सुब्ह फूटी तो
Read Moreयह मौसमे-गुल गर चे तरबख़ेज़ बहुत है यह मौसमे-गुल गर चे तरबख़ेज़ बहुत है अहवाले गुल-ओ-लाला ग़म-अँगेज़ बहुत है ख़ुश
Read Moreय’ किस ख़लिश ने फिर इस दिल में आशियाना किया य’ किस ख़लिश ने फिर इस दिल में आशियाना किया
Read Moreउमीदे-सहर की बात सुनो जिगर-दरीदा हूं, चाके-जिगर की बात सुनो अलम-रसीदा हूं, दामने-तर की बात सुनो ज़बां-बुरीदा हूं, ज़ख़्मे-गुलू से
Read Moreजिस रोज़ क़ज़ा आएगी किस तरह आएगी जिस रोज़ क़ज़ा आएगी शायद इस तरह कि जिस तौर कभी अव्वल शब
Read Moreअश्क आबाद की इक शाम जब सूरज ने जाते-जाते अश्क आबाद के नीले उफ़क से अपने सुनहरी जाम में ढाली
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