Gulzar – Paanch bje hain
पाँच बजे हैं पाँच बजे हैं टी.वी. पर आनेवाले हफ़्ते की झाँकी ‘इस हफ़्ते में…’ सोमवार जाना है तुमको— टी.वी.
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पाँच बजे हैं पाँच बजे हैं टी.वी. पर आनेवाले हफ़्ते की झाँकी ‘इस हफ़्ते में…’ सोमवार जाना है तुमको— टी.वी.
Read Moreजिसके गालों में टिप्पे पड़ते हैं ज़िक़्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना बन गया रक़ीब आख़िर था जो
Read Moreगली में बारिश होती है तो पानी को भी लग जाते हैं पावँ दरों दीवार से टकरा के गुज़रता है
Read Moreरात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती
Read Moreदिखाई देते हैं धुँद में जैसे साए कोई दिखाई देते हैं धुँद में जैसे साए कोई मगर बुलाने से वक़्त
Read Moreहर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए दो दिन
Read Moreएक लम्स एक लम्स हल्का सुबुक और फिर लम्स-ए-तवील दूर उफ़क़ के नीले पानी में उतर जाते हैं तारों के
Read Moreरूह देखी है कभी! रूह देखी है, कभी रूह को महसूस किया है ? जागते जीते हुए दूधिया कोहरे से
Read Moreफ़ासला तकिये पे तेरे सर का वह टिप्पा है, पड़ा है चादर में तेरे जिस्म की वह सोंधी सी–ख़ुशबू हाथों
Read Moreवो जो शायर था चुप सा रहता था वो जो शायर था चुप-सा रहता था बहकी-बहकी-सी बातें करता था आँखें
Read Moreलैण्डस्केप दूर सुनसान- से साहिल के क़रीब इक जवाँ पेड़ के पास उम्र के दर्द लिए, वक़्त का मटियाला दुशाला
Read Moreनीले-नीले से शब के गुम्बद में नीले-नीले से शब के गुम्बद में तानपूरा मिला रहा है कोई एक शफ़्फ़ाक काँच
Read Moreखोलकर बाँहों के दो उलझे हुए-से मिसरे खोलकर बाँहों के दो उलझे हुए-से मिसरे हौले से चूमके दो नींद से
Read Moreसब्र हर बार इख़्तियार किया सब्र हर बार इख़्तियार किया हम से होता नहीं हज़ार किया आदतन तुम ने कर
Read Moreअख़बार सारा दिन मैं खून में लथपथ रहता हूँ सारे दिन में सूख-सूख के काला पड़ जाता है ख़ून पपड़ी
Read Moreहम तो कितनों को मह-जबीं कहते हम तो कितनों को मह-जबीं कहते आप हैं इस लिए नहीं कहते चाँद होता
Read Moreउखाड़ दो अरज़-ओ-तूल खूँटों से बस्तियों के उखाड़ दो अरज़-ओ-तूल खूँटों से बस्तियों के समेटो सड़कें, लपेटो राहें उखाड़ दो
Read Moreआज फिर चाँद की पेशानी से उठता है धुआँ आज फिर चाँद की पेशानी से उठता है धुआँ आज फिर
Read Moreइक इमारत इक इमारत है सराय शायद, जो मेरे सर में बसी है. सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते हुए जूतों की धमक, बजती
Read Moreथर्ड वर्ल्ड जिस बस्ती में आग लगी थी कल की रात उस बस्ती में मेरा कोई नहीं रहता था, औरतें
Read Moreसहमा सहमा डरा सा रहता है सहमा सहमा डरा सा रहता है जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है काई
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