Mirza Ghalib – Koi din gar zindgaani aur hai
कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है अपने जी में हमने ठानी और है आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गरमी कहां सोज़-ए-ग़म-हाए-नेहानी और
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कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है अपने जी में हमने ठानी और है आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गरमी कहां सोज़-ए-ग़म-हाए-नेहानी और
Read Moreकयों जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर जलता हूं अपनी ताकत-ए-दीदार देख कर आतिश-परसत कहते हैं अहल-ए-जहां मुझे सर-गरम-ए-नाला-हा-ए-शरर-बार देख
Read Moreआमद-ए-ख़त से हुआ है सरद जो बाज़ार-ए-दोसत दूद-ए-शम-ए-कुशता था शायद ख़त-ए-रुख़सार-ए-दोसत ऐ दिले-ना-आकबत-अन्देश ज़बत-ए-शौक कर कौन ला सकता है ताबे-जलवा-ए-दीदार-ए-दोसत
Read Moreकोटि-कोटि आकुल हृदयों में सुलग रही है जो चिनगारी, अमर आग है, अमर आग है। उत्तर दिशि में अजित दुर्ग
Read Moreपुष्प कंटकों में खिलते हैं, दीप अंधेरों में जलते हैं । आज नहीं , प्रह्लाद युगों से, पीड़ाओं में ही
Read Moreझुकी न अलकें झपी न पलकें सुधियों की बारात खो गई रोते रोते रात सो गई दर्द पुराना मीत न
Read Moreकयोंकर उस बुत से रखूं जान अज़ीज़ क्या नहीं है मुझे ईमान अज़ीज़ दिल से निकला प न निकला दिल
Read Moreइबने-मरियम हुआ करे कोई मेरे दुख की दवा करे कोई शरअ-ओ-आईन पर मदार सही ऐसे कातिल का क्या करे कोई
Read Moreहम से खुल जायो ब-वकते-मै-परसती एक दिन वरना हम छेड़ेंगे रख कर उज़र-ए-मसती एक दिन ग़र्रा-ए औज-ए-बिना-ए-आलम-ए-इमकां न हो इस
Read Moreइशरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना तुझसे किस्मत में मेरी
Read Moreसुरमा-ए-मुफ़त-ए-नज़र हूं, मेरी कीमत ये है कि रहे चशम-ए-ख़रीदार पे एहसां मेरा रुख़सत-ए-नाला मुझे दे कि मबादा ज़ालिम तेरे चेहरे
Read Moreअरज़-ए-नियाज़-ए-इशक के काबिल नहीं रहा जिस दिल पे नाज़ था मुझे, वो दिल नहीं रहा जाता हूं दाग़-ए-हसरत-ए-हसती लिये हुए
Read Moreतू दोसत किसी का भी सितमगर न हुआ था औरों पे है वो ज़ुलम कि मुझ पर न हुआ था
Read Moreहुयी ताख़ीर तो कुछ बायसे-ताख़ीर भी था आप आते थे, मगर कोई इनांगीर भी था तुम से बेजा है मुझे
Read Moreयक ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बेकार बाग़ का यां जादा भी फ़तीला है लाले के दाग़ का बे-मै किसे है ताकत-ए-आशोब-ए-आगही खेंचा
Read Moreबज़मे-शाहनशाह में अशआर का दफ़तर खुला रखियो या रब! यह दरे-ग़ंजीना-ए-गौहर खुला शब हुयी फिर अंजुमे-रख़शन्दा का मंज़र खुला इस
Read Moreमहरम नहीं है तू ही नवा-हाए-राज़ का यां वरना जो हिजाब है, परदा है साज़ का रंगे-शिकसता सुबहे-बहारे-नज़ारा है ये
Read Moreजुज़ कैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार सहरा मगर ब-तंगी-ए-चशम-ए-हसूद था आशुफ़तगी ने नक्श-ए-सवैदा किया दुरुसत ज़ाहर हुआ कि दाग़
Read Moreकहते हो, न देंगे हम, दिल अगर पड़ा पाया दिल कहां कि गुम कीजे ? हमने मुद्दआ पाया इशक से
Read Moreसतायश गर है ज़ाहद इस कदर जिस बाग़े-रिज़वां का वह इक गुलदसता है हम बेख़ुदों के ताके-निसियां का बयां क्या
Read Moreदहर में नक्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ है यह वो लफ़ज़ कि शरमिन्दा-ए-माअनी न हुआ सबज़ा-ए-ख़त से तेरा काकुल-ए-सरकश न दबा
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