Hindi Poetry

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Mirza Ghalib – Na gul ae nagma hoon

न गुल-ए-नग़मा हूं, न परदा-ए-साज़ मैं हूं अपनी शिकसत की आवाज़ तू, और आरायश-ए-ख़म-ए-काकुल मैं, और अन्देशा-हाए-दूरो-दराज़ लाफ़-ए-तमकीं फ़रेब-ए-सादा-दिली हम

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